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पिछ्ले कुछ दिनों से देश की सियासत में वन नेशन, वन इलेक्शन” बिल ने एक नये बहस को जन्म दे दिया है। और देश की आम जनता में भी इस बिल को लेकर उत्सुकता बढ़ती जा रही है। इसी बिल के तमाम महत्वपूर्ण जानकारियों को समेटी है जन उजाला संवाददाता अंजना कुमारी की यह विशेष रिपोर्ट :- 

एक राष्ट्र, एक चुनाव भारत सरकार द्वारा देश में सभी चुनावों को एक ही दिन या एक ही समय सीमा के भीतर करने का प्रस्ताव विचाराधीन है । इसके सबसे उल्लेखनीय प्रस्तावों में से एक लोकसभा और सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों की राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराया जायेगा ।


तर्क और आवश्यकता

1. बार-बार चुनावों से रुकावट : भारत में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समय पर चुनाव होते हैं। इससे सरकारी कामों में बार-बार रुकावट आती है और विकास के काम धीमे हो जाते हैं।

2. खर्च में कमी: लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों में भारत के चुनाव आयोग को 4,500 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आता हैं।अगर सारे चुनाव एक साथ हों, तो खर्चा कम होगा।

3. सुरक्षा और संसाधनों की बचत: चुनावों के दौरान सुरक्षा बलों और अन्य संसाधनों की जरूरत होती है। बार-बार चुनावों से इन पर दबाव बढ़ता है। एक साथ चुनाव होने से इस पर नियंत्रण रखा जा सकता है।

4. सभी के लिए बराबरी: एक साथ चुनाव होने से देशभर में एक समान मुद्दों पर चर्चा होगी और जनता को सही निर्णय लेने में आसानी होगी।


पहले कब-कब एक साथ हुए चुनाव ?

आजादी के बाद देश के कई राज्यों में पहली बार 1951-52 में चुनाव हुए। तब लोकसभा के साथ ही सभी राज्यों की विधानसभा के चुनाव भी संपन्न हुए थे। इसके बाद 1957, 1962 और 1967 में भी एक साथ लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराए गए। 1968-69 के बाद यह सिलसिला टूट गया, क्योंकि कुछ विधानसभाएं विभिन्न कारणों से भंग कर दी गई थीं।

फायदे और नुकसान

फायदे:
1. कम खर्च: अलग-अलग समय पर चुनाव कराने में बहुत पैसा खर्च होता है। एक साथ चुनाव कराने से खर्च में भारी कमी आएगी।

2. शासन में स्थिरता: बार-बार चुनाव होने से सरकार का ध्यान विकास कार्यों से हट जाता है। एक साथ चुनाव से सरकार को पूरा समय काम पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिलेगा।

3. सुरक्षा और प्रशासनिक बोझ में कमी: चुनाव के दौरान सुरक्षा बलों और प्रशासन पर काफी दबाव होता है। एक बार में चुनाव कराने से यह दबाव कम हो सकता है।

4. अधिक मतदान: कई बार लोगों को अलग-अलग चुनावों में मतदान करना मुश्किल लगता है। अगर सभी चुनाव एक साथ हों, तो लोगों की भागीदारी बढ़ सकती है।

नुकसान:
1. संवैधानिक चुनौतियाँ: यदि किसी राज्य सरकार का कार्यकाल बीच में समाप्त हो जाता है, तो नए चुनाव कराना पड़ेगा। इससे “वन नेशन, वन इलेक्शन” की योजना में मुश्किलें आ सकती हैं।

2. राज्यों की स्वतंत्रता में कमी: चुनाव राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, और एक साथ चुनाव कराने से राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

3. लोकल मुद्दों पर ध्यान कम: विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ होने पर राष्ट्रीय मुद्दों का ज्यादा प्रभाव रहेगा और राज्यों के स्थानीय मुद्दे नजरअंदाज हो सकते हैं।

4. तैयारी में कठिनाई: चुनाव आयोग, सुरक्षा बलों और प्रशासन के लिए एक साथ चुनाव की तैयारी करना एक बड़ी चुनौती हो सकती है, खासकर इतने बड़े देश में।


इन देशों में ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ हैं।

बता दें कि दुनिया के कई देशों में चुनाव एक साथ होते हैं। उदाहरण के लिए स्वीडन में हर चार साल में आम चुनाव के साथ राज्‍यों और जिला परिषदों के चुनाव होते हैं। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका में भी आम चुनाव और राज्‍यों के चुनाव एक साथ होते हैं। दुनिया के बाकी देशों में ब्राजील, फिलीपींस, बोलिविया, कोलंबिया,कोस्‍टोरिका, ग्वाटेमाला, गुयाना और होंडुरास जैसे अन्य देशों में भी राष्ट्रपति प्रणाली के तहत राष्ट्रपति और विधायी चुनाव एक साथ होते हैं।


पेज और समिति

वन नेशन वन इलेक्शन कुल 18,626 पनों मैं बनायीं गयी हैं। वही 2 सितम्बर 2023 को पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द कि अध्यक्षता में इस बिल के लिए उच्च स्तरीय समिति का घटन किया गया था।

समर्थन और विरोध

इस बिल के पक्ष में 32 पार्टियां अपना समर्थन दें रही है तो दूसरी और 15 ऐसी पार्टियां है जो विरोध में है। इनमें भाजपा और उसके घटक दलो ने उन्हे अपना समर्थन दे रही हैं। तो वही विपक्ष की कुछ पार्टियों का भी इस बिल को समर्थन देने की संभावनाए है।

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